लकड़ी जलकर ,कोयला बनती है ,
अरमान जब जलते हैं तो,
न कोयला बनते हैं न राख,
तुम क्यों चले गए ,दूर इतने
हमसे,के इन नैनों में न आंसू
बचे,न बचा कोई ख्वाब ।
About Ritu Jain!
- Ritu Jain " Mystic Colors Of Life"
- New Delhi, India
- I am Ritu Jain,48 years and happily married . I live in Delhi. A Housewife who is a Psychology Hons. Graduate and wants to bring cheer and smile to every person who does not have one.Being creative is my lifeline. I am very happy today that I have launched my own Blog, to share my poems,thoughts,experiences and various colors in my life.
Wednesday, June 24, 2009
Tuesday, June 23, 2009
Monday, June 22, 2009
अपराध का बोलबाला ,हर तरफ़ हो गया है,
बेखौफ होकर जीना,एक सपना सा बन गया है,
माँ की कोख से बाहर की दुनिया ,
में आने से हर बच्चा डर रहा है,
अन्याय बढ गया है,बढ गए अत्याचारी,
मजबूर हो गया हर व्यक्ति,बेबस हुई नारी,
माँ की ममता,लाज औरत की दांव पर लगी है,
पाप बढ चुका है इतना,परेशां हर शख्स हो गयाहै,
भगवान्,भी अपनी दुनिया को देख सिहर उठा है.
बेखौफ होकर जीना,एक सपना सा बन गया है,
माँ की कोख से बाहर की दुनिया ,
में आने से हर बच्चा डर रहा है,
अन्याय बढ गया है,बढ गए अत्याचारी,
मजबूर हो गया हर व्यक्ति,बेबस हुई नारी,
माँ की ममता,लाज औरत की दांव पर लगी है,
पाप बढ चुका है इतना,परेशां हर शख्स हो गयाहै,
भगवान्,भी अपनी दुनिया को देख सिहर उठा है.
Sunday, June 21, 2009
हमे अक्सर सताती हैं,बचपन की यादें,
अपने संगी-साथियों के संग ,बतियाते
बिताये ,अनगिनत दिन और रातें ,
वो बारिश में ,कागज़ की नांव बहाना ,
गुड्डे -गुडियों का ब्याह रचाना,
बागों में रंग-बिरंगी तितलियों को पकड़ना ,
न रिश्तों का बन्धन ,न कोई फ़िक्र ,न परेशानी,
वो अल्हड सा जीवन ,वो सावन के झूले,
वो चाँद को मामा कहकर बुलाना ,हम आज तक न भूले,
वो बचपन की मौज-मस्ती कैसे कोई भूले.
अपने संगी-साथियों के संग ,बतियाते
बिताये ,अनगिनत दिन और रातें ,
वो बारिश में ,कागज़ की नांव बहाना ,
गुड्डे -गुडियों का ब्याह रचाना,
बागों में रंग-बिरंगी तितलियों को पकड़ना ,
न रिश्तों का बन्धन ,न कोई फ़िक्र ,न परेशानी,
वो अल्हड सा जीवन ,वो सावन के झूले,
वो चाँद को मामा कहकर बुलाना ,हम आज तक न भूले,
वो बचपन की मौज-मस्ती कैसे कोई भूले.
Saturday, June 20, 2009
Friday, June 19, 2009
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