झूठे सुख को सुख कहें,मानत हैं मन मोद,
जगत चबैना काल का,कछु मुख में कछु गोद|
संसार तो काल के चबाने की तरह है,कुछ व्यक्ति उसके ग्रास बन चुके हैं आर कुछ व्यक्तियों को अपना ग्रास बनाने के लिए उसने अपने गोद में बैठा रखा है|ब्रह्म सत्यम जगत मिथ्या का यही अर्थ है|
क्यों काल के निर्दयी पंजे ने,
छीना तुम्हे हमसे,
दर्द और दुःख से द्रवित हो गया मन,
हर दिशा से जैसे सुनाई देने लगा,क्रंदन,
तुम दूर हो गए हमसे,तोड़ के सब बन्धन,
शायद जीते-जी तो,तुमसे न होगा मिलना कभी,
पर राह हमारी देखना,
शीघ्र ही हम,तुमसे मिलने आएँगे,उस पार कभी|
"The body and the mind are just like a person's outer clothes.When his clothes are old,a person discards them and puts on a new set of clothes.Similarily,when the soul gives up his old body at death,he takes on a new body."