क्यों काल के निर्दयी पंजे ने,
छीना तुम्हे हमसे,
दर्द और दुःख से द्रवित हो गया मन,
हर दिशा से जैसे सुनाई देने लगा,क्रंदन,
तुम दूर हो गए हमसे,तोड़ के सब बन्धन,
शायद जीते-जी तो,तुमसे न होगा मिलना कभी,
पर राह हमारी देखना,
शीघ्र ही हम,तुमसे मिलने आएँगे,उस पार कभी|
Pyari didi! Tum itni jaldi uss par na jana, agar jana toh hame bhi saath le jana.
ReplyDeletelittle sis!
May Prem Uncle's soul rest in peace