Wednesday, August 11, 2010

एक व्यक्ति खुद को दुनिया का सबसे दुखी आदमी समझता था|उसने एक दिन परमात्मा से प्रार्थना की,'हे प्रभु,मेरे सिवाय दुनिया में सभी सुखी नज़र आतें हैं,तू मुझे इतना दुःख न दे की मैं सह न सकूं|एक कृपा कर,तू मुझे किसी और का दुःख दे दे|मेरा दुःख किसी और को दे दो|'रात में उसने एक स्वप्न देखा|एक कमरे में चारों ओर बहुत सी खूटियाँ लगीं थी|उस कमरे में जो भी आता उसकी पीठ पर दुखों की गठरी बंधी थी|सभी आकर अपनी दुखों की गठरी किसी खूँटी पर टांगते और बैठ जाते|उस व्यक्ति ने अपनी दुखों की गठरी भी वहां टांग दी| तभी वहां एक आवाज़ गूंजी,जिसे भी अपनी गठरी बदलनी हो बदल लो,चलो एक-एक गठरी उठा लो|सभी गठरियाँ उठाने दौड़े,पर सभी ने अपनी-अपनी गठरी उठाई,किसी दूसरे की गठरी को हाथ नहीं लगाया|उसी समय उस व्यक्ति की नींद टूट गयी,वह स्वप्न का आशय समझ गया|उसे समझ में आ गया की दुखी होने का कोई अर्थ नहीं है,दुनिया में हर कोई दुखी है|बेहतर है की दुखों से संघर्ष करके सुख की खोज की जाए|

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