Sunday, May 30, 2010


क्यों ये बांवरा मन,कभी-कभी,
करने लगता है,वर्षा की नन्ही बूंदों से बातें,
क्यों इस बाँवरे मन को,कभी-कभी,लगते हैं,
दिन अँधेरे,और उजाले से नहाई हुई रातें,
ये मन की चंचलता ही तो है,जो कभी-कभी,
अपनों का प्यार भी समझ नहीं आता,और
बहुत भाती हैं,परायों की समझ न आने वाली बातें|

1 comment:

  1. "ये मन की चंचलता ही तो है,जो कभी-कभी,
    अपनों का प्यार भी समझ नहीं आता,और
    बहुत भाती हैं,परायों की समझ न आने वाली बातें|"
    जी बिलकुल सही आपने सोच को सही और सार्थक शब्द दिए हैं

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