Saturday, April 10, 2010

ढलते हुए सूरज को देखकर,
बेचैनी बढ़ने लगी,
तुम्हारे दीदार की प्यासी अँखियाँ,
बोझिल सी होने लगीं,
मेरी तन्हाई भी मुझसे आँखें ,
छुपाकर रोने लगी,
तुम तो न आए,पर तुम्हारी याद,
मुझे फिर से सताने लगी|

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