Sunday, March 29, 2009

कहाँ हैं मन का मीत मेरा ,
जो गुनगुनाया वोह गीत मेरा,
बचपन से प्यार था दिल में तुम्हारे लिए,
इज़हार कभी जुबां पर आया तुम्हारे लिए|
रिश्ते कच्चे धागों की तरह नाज़ुक और कमज़ोर होते हैं,
ढीला छोड़ो तो बेमानी , और ज्यादा खीचने से टूटने लगते हैं,
वैसे तो रिश्तो में बंधकर जीते हैं सभी,
विरले हैं जो इनका अर्थ समझ पाते हैं कभी |

My Past Year's Experience in these very Days!!

Day 2 : 29th March,2008 Place : Max Hospital

[29th March,2008 ]" हस्पताल में मेरा दूसरा दिन, हाथ में ड्रिप लगी थी | दर्द के मारे आधी रात तकमुझे नींद नही आई | सुबह पाँच बजे नींद खुल गई | यह कैसी सुबह थी , चिड़ियों कि आवाजें , मेरे आस पास कि हरियाली मेरा प्यारा कुत्ता - सीज़ू | कुछ अधूरी सुबह थी यह, एक अजीब सी बेचैनी लिए हुए | फ़िर मैंने एक भजन गया ' भूर्भवः .....' की टेप सुनी | मेरा मन स्थिर हो गया और प्रसन्न भी | शाम कोअपने माता पिता को मिलकर मुझे जैसा सारा जहाँ मिल गया| मैं भगवान् कि बहुतशुक्रगुजार हूँ कि वह मुझ पर इतना मेहरबान हैं |