ऐ मेरे मन ,चल बहुत दूर कहीं,
जहाँ धरती और गगन साथी बनकर,
बांटते हों,अपने-अपने फ़साने,
हवा के ठंडे झोंके ,गाकर सुनाते हों ,
प्यार भरे तराने,
ऐ,मेरे मन चल सागर के बींचोबीच ,
जहाँ लहरें बल खाती हुई ,मुझे पुकारें,
सूरज और चंदा सुनाएँ एक-दूसरे को,
अपने-अपने भूले-बिसरे अफ़साने।
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