कठपुतली है ,वक़्त के हाथों की,
हर जीव,जंतु और इंसान,
न जाने कितने पलों को जोड़कर,
बने है,आज और बीते हुए कल,
कुछ आधी,कुछ अधूरी रहीं ,कुछ
पूरी हो गईं ,इच्छाएँ जो थी अनगिनत,
संसार में जन्म लेते ही जुड़ गए ,
रिश्ते-नाते बेहिसाब,
अपने ही जाल में उलझ कर भूल गया,
अपने जन्मदाता को भी इंसान।
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