Saturday, April 25, 2009

कभी बाँध कर नहीं रख पाओगे ,मेरे मन को तुम,
लाख पहरे बिठाने की कोशिश करते रहो तुम,
रोक न सकेगी ,इसे कोई भी दरो-दीवार ,
प्रयत्न करके देखलो चाहे तुम हज़ार,
हवा के झोंके की निकल जायेगा ,बिन देखे रात या दिन ,
सीमा लांघकर कोई भी ,जा सकता है किसी ओर ,
अंतहीन है इसकी उड़ान ,जिसका नहीं कोई छोर ।

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