सपने देखतीं हैं आँखें,और
उड़ने लगता है,मन
आसमानों की तरफ ले जातें हैं,सपने
और झूमनें लगता है,मन
आँखों में सुनहरे ख्वाब सजाकर ,
लुप्त हो जातें हैं,सपने
किसी और दुनिया में,बेचैन मन को
छोड़कर,धरातल की धरती पर|
About Ritu Jain!
- Ritu Jain " Mystic Colors Of Life"
- New Delhi, India
- I am Ritu Jain,48 years and happily married . I live in Delhi. A Housewife who is a Psychology Hons. Graduate and wants to bring cheer and smile to every person who does not have one.Being creative is my lifeline. I am very happy today that I have launched my own Blog, to share my poems,thoughts,experiences and various colors in my life.
Saturday, April 24, 2010
Friday, April 23, 2010
Thursday, April 22, 2010
Wednesday, April 21, 2010
Tuesday, April 20, 2010
Monday, April 19, 2010
आज़ादी क्या होती है,
पूछो,पिंजरे के पंछी से,
जो पिंज़रे की दीवारों से अपने
सिर को पटक-पटक,भूल चुका है उड़ना तक,
हर पल अपने मन को मसोसता वह,
अपने सय्याद को हर सांस में कोसता वह,
कैद में तो,भारी लगता है हर क्षण,
बंद पिंजरे में,जीवन एक बोझ से कम नहीं,
दूसरों को उड़ता देख,हर पल एक टीस सी उठती होगी,
हाथ उठाकर,ईश्वर से कहता होगा,
तुझे किस्मत मेरी बदलनी होगी|
Sunday, April 18, 2010
Saturday, April 17, 2010
Friday, April 16, 2010
Thursday, April 15, 2010
Wednesday, April 14, 2010
Tuesday, April 13, 2010
Monday, April 12, 2010
Sunday, April 11, 2010
माँ की ममता
उठ ,जाग ,बस , और मत सो मेरे लाल |यह एक माँ का रुदन था जो मेरे दिल को रुला गया |रोज की तरह , सुबह मैं दूध लेने निकली , तो एक हृदय विदारक दृश्य देखकर ठिठक गई मैं |एक छोटा सा कुत्ते का पिल्ला सड़क के किनारे चिर निद्रा में सो रहा था |उसके मुंह और एक पैर पर लहू लगा था ,शांति थी (दुःख से भरी )और एक माँ,उस नन्हे से कुत्ते की |वह विलाप कर रही थी और सोच रही थी ,की उसका पुत्र क्यों नहीं उठ रहा |अपने पैर से उसे हिला-हिलाकर कर मानो ,पूछ रही हो क्या हुआ तुम्हे ,उठकर खेल-कूद ,इस समय सोने का क्या अभिप्राय है |
इस दृश्य ने मुझे बहुत अशांत कर दिया |जैसे समुद्र के शांत जल में किसी ने कंकड़ फैंक दिया हो |सवालों से घिर गया मन ,न मन लगा किसी काम में ,न काज में |भारत माँ के बहुत से पुत्र भी सो गए है , गहरी नींद में ,बेखबर होकर अपने देश की परेशानियों से मुंह मोड़कर अपने कर्तव्यों से | आँखे चुराकर अपने भाइयो से (देशवासियों) की तरफ अपने फर्ज से और व्यर्थ है सब रिश्ते -नाते |दुःख देते है जीते -जी और मरने के बाद भी |
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