Saturday, November 12, 2011

एक दिन शारीर के अंगों मैं अपने अपने  महत्व को लेकर बहस छिड गई| हाथों ने अपनी शक्ति का प्रदर्शन करते हुए शेखी  मारी की यदि मैं काम करना छोड़ दूं तो पत्ता भी नहीं हिल सकता | 
पैरों ने ज़मीन  पर ठोकर मारते हुए दंभ दिखाया "मुझ पर  ही तो सम्पूर्ण  शारीर अवलंबित है| मेरे बिना वह मांस के लोथड़े के सिवा कुछ भी नहीं है | मुंह ,नाक , कान सबने बारी - बारी  अपने महत्व को स्थापित किया |इन अंगों की बहस सुनकर शारीर के आंतरिक अंग दिल - दिमाग आदि भी सतर्क हो गये पर वे कुछ बोलते , उससे पहले ही पांव पर एक कीड़े  ने डंक मार दिया | मस्तिष्क के आदेश पर हाथों ने आखों  की सहायता लेकर कीड़े  को तत्काल चुटकी से पकड़कर फैंक दिया |डंक की जलन को कम करने के लिए मुंह जब पीड़ित स्थान पर फूंक  मारने लगा  तभी अन्य अंग हरकत में आ गये और  वे समझ गये की सहयोग , समन्वय और एकता से ही शरीर का अस्तित्व है|