Sunday, January 9, 2011

विशाल है धरती,विशाल है गगन,
फिर न जाने क्यों संकुचित है,इंसान का मन 
जीता हैअपने लिए,अपने लिए मर जाता है,
विरला है वो,जो परसेवा में जीवन बिताता है|