Thursday, November 4, 2010

हो अँधेरी रात कितनी,
पर दिया जलाना कहाँ मना है,
आँखों में हो कितने आंसू,
पर मुस्कुराना कहाँ मना है,
जीवन की डगर पर,न मिले किसी का साथ,
पर अकेले ही,हिम्मत से आगे बढना कहाँ मना है|